ममता की हार से डर रहे हैं अखिलेश… प्रशांत किशोर ने आईपीएसी से तोड़ा नाता, 2027 के लिए सपा का बड़ा यू-टर्न

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों का असर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति पर साफ नजर आने लगा है. बीजेपी की जीत ने न सिर्फ ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया, बल्कि समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को भी बड़ा झटका दिया. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सपा ने मशहूर चुनाव रणनीतिकार संगठन आईपीएसी से अपना रिश्ता खत्म कर लिया है और अब नई टीम के साथ आगे बढ़ने की तैयारी में है. इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है.
SP ने IPAC से अपना रिश्ता क्यों तोड़ा?
2027 का चुनाव अखिलेश यादव के लिए काफी अहम माना जा रहा है. इस चुनाव को जीतने के लिए सपा ने पहले आईपीएसी को सर्वे और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी दी थी. आईपीएसी वही संगठन है जिसने 2021 में तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के लिए रणनीति बनाई थी. कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी के कहने पर ही एसपी ने आईपीएसी को काम सौंपा था. लेकिन दोनों राज्यों में हार के बाद सपा ने यह समझौता ख़त्म कर दिया.
ईडी की जांच और डेटा सुरक्षा बनी बड़ी वजह
सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रबंधन को लेकर उठे सवालों ने एसपी को सतर्क कर दिया है. इसके अलावा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच और छापेमारी ने भी चिंता बढ़ा दी है. एसपी को डर था कि चुनाव के आंकड़े और दस्तावेज लीक हो सकते हैं. इसलिए अखिलेश यादव ने समय रहते आईपीएसी से दूरी बनाना ही सही समझा.
ढाई माह में ही अनुबंध समाप्त हो गया
दिलचस्प बात यह है कि एसपी ने ढाई महीने पहले ही यह काम आईपीएसी और शोटाइम नाम की कंपनी को सौंपा था। लेकिन इतने कम समय में ही आईपीएसी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. एक वजह यह भी बताई जा रही है कि आईपीएसी टीम ज्यादातर यूपी के बाहर से काम कर रही थी, जिससे स्थानीय समझ पर सवाल खड़े हो गए थे.
आईपीएसी और शोटाइम जिम्मेदारियाँ
आईपीएसी को उन सीटों पर फोकस करने का काम दिया गया जहां पिछली बार एसपी मामूली अंतर से हार गई थी. माइक्रो टारगेटिंग के जरिए जीत की रणनीति बनाई जा रही थी. वहीं शोटाइम को सोशल मीडिया और पब्लिसिटी का काम दिया गया. अब IPAC को हटा दिया गया है, लेकिन शोटाइम अपना काम जारी रखेगा.
अब कौन संभालेगा सपा का चुनावी मोर्चा?
आईपीएसी के हटने के बाद अब सपा अपनी अंदरूनी टीम और स्थानीय नेताओं पर भरोसा करेगी. इसके अलावा छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर सर्वे और सोशल मीडिया का काम किया जाएगा। पार्टी अब बाहरी एजेंसियों के बजाय अपने संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।
